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प्रभा खेतान पंचतत्व में विलीन

 

कोलकाता, 21 सितम्बर (आईएएनएस)। स्त्री मन की कुशल चितेरी, वरिष्ठ रचनाकार प्रभा खेतान आज यहां पंचतत्व में विलीन हो गईं उनका शुक्रवार देर रात दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। वे 66 वर्ष की थीं।

 

एक कवयित्री, नारीवादी चिंतक और उद्यमी आदि विविध रूपों में अपनी पहचान बनाने वाली प्रभा खेतान को दो दिन पहले दिल की तकलीफ के बाद अस्पताल में दाखिल कराया गया था। नवंबर 1942 में कोलकाता के एक रुढ़िवादी मारवाड़ी परिवार में जन्मी प्रभा ने तत्कालीन बंद समाज के दायरे को तोड़कर अपने लिए मंजिलें और उनके रास्ते खुद तय किए। ज्यां पाल सार्त्र के अस्तित्ववाद पर पीएचडी करने के बाद प्रभा ने अपना व्यवसाय खड़ा कर आर्थिक आत्मनिर्भरता अर्जित की।

 

प्रभा खेतान का लेखन स्त्री मनोविज्ञान की गहन जांच पड़ताल करता है। 'बाजार में खड़ी स्त्री' और अपनी जीवनी 'अन्या से अनन्या तक' समेत अपनी विभिन्न रचनाओं में उन्होंने औरत के हक, भूमंडलीकरण और बाजारीकरण के दौर में उसकी स्थिति पर अपनी बात बेधड़क होकर कही।

 

उनके निधन पर सुप्रसिध्द साहित्यकार ममता कालिया ने आईएएनएस से कहा, ''मैं गोवा में थी जब मुझे उनकी मृत्यु का समाचार मिला। मुझे तो एकदम यकीन नहीं हुआ कि मात्र दो दिनों की बीमारी में वे इस तरह अचानक चली जाएंगी। हम कोलकाता में खूब समय साथ-साथ बिताते थे। उन्होंने स्त्री को केंद्र बनाकर अनेक समर्थ रचनाएं कीं। खुद अपनी जीवनी में उन्होंने लिखा है कि स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाए तो वह अपने प्रेम के लिए किसी भी पुरुष को खरीद सकती है।''

 

उनका पहला काव्य संग्रह 'उजाले' सन 1981 में और पहला उपन्यास 'आओ पेपे घर चलें' 1990 में प्रकाशित हुआ। एक और आकाश की खोज, कृष्णधर्म, सीढ़ियां चढ़ती हुई मैं आदि उनके प्रसिध्द काव्य संग्रह हैं और छिन्नमस्ता, तालाबंदी, अग्निसंभवा, स्त्री पक्ष उनकी प्रमुख औपन्यासिक कृतियां हैं।

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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