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मुख्यमंत्री मायावती पर बसपा प्रमुख
मायावती भारी रहीं

 

लखनऊ , 10 मई (आईएएनएस)। उत्तरप्रदेश में मायावती सरकार अपना एक वर्ष पूरा करने जा रही है। गत वर्ष तेरह मई को बसपा सुप्रीमो मायावती ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी । उनका एक साल का अब तक का कार्यकाल प्रशासनिक तौर पर कम और राजनीतिक तौर पर अधिक चर्चित रहा। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री मायावती पर बसपा प्रमुख मायावती भारी रहीं।

 

चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी मायावती और कांग्रेस के बीच शुरूआती दिनों में तो रिश्ते ठीक रहे लेकिन फिर जल्दी ही रिश्तों में तल्खी आने लगी और आरोप प्रत्यारोप का ऐसा दौर चला जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। कभी राहुल गांधी के दलित प्रेम को ढकोसला बताकर तो कभी बुंदेलखण्ड के लिए पैकेज को लेकर मायावतीं जब तब केन्द्र सरकार पर निशाना साधती रहीं। 

 

सूबे में सत्ता संचालन के साथ-साथ उनका ध्यान दिल्ली की गद्दी को हासिल करने के लिए जोड़ तोड़ बैठाने में लगा रहा। उत्तर प्रदेश के बाहर पार्टी का विस्तार उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में रहा और उन्होंने हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, कर्नाटक, तमिलनाडु सहित तमाम राज्यों में पार्टी सम्मेलन किए जो लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर केन्द्रित थे।

 

विधानसभा में पूर्ण बहुमत के बावजूद मायावती अपना संख्या बल बढ़ाने में लगी रहीं और इसके लिए उन्होंने एक के बाद एक कई विपक्षी विधायकों के इस्तीफे दिलाकर उन्हें बसपा के टिकट पर चुनाव लड़वाकर निर्वाचित कराया। राजपाल त्यागी को मंत्री बनाकर मायावती ने यह जताया कि पार्टी और सरकार में दल बदलने वालों के लिए भी सम्मानजनक स्थान है।

 

दरअसल मायावती का यह दांव संख्या बल बढ़ाने से ज्यादा राजनैतिक विरोधियों पर दबाव बनाने और जनमानस में यह संदेश देने के लिए था कि बसपा की लोकप्रियता बढ़ रही है और विपक्षियों के खेमे में भगदड़ जैसे हालात हैं। जानकारों का कहना है कि मायावती का यह दांव अभी जारी रहेगा और अब उनके निशाने पर मुख्य रूप से कांग्रेस और सपा के विधायक हैं।

 

अस्सी लोकसभा सीटों वाले देश के सबसे बड़े राज्य से ही 40-50 सीटें हासिल करने की योजना पर तो उनका काम बदस्तूर जारी ही रहा। अधिकांश सीटों पर बसपा ने उम्मीदवार पहले से ही तय कर रखे थे लेकिन अब नए परिसीमन के तहत चुनाव होने के कारण सीटों के भूगोल में जो परिवर्तन हुए हैं उसके मद्देनजर उम्मीदवारों के चयन में आवश्यक फेरबदल किए जा रहे हैं।

 

जाहिर है कि मायावती ने गुजरे एक साल में सूबे की हुकूमत का भरपूर उपयोग अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आकार देने और उन्हें हकीकत में तब्दील करने के लिए किया है। सत्ता अभी भी कायम है और माना जाना चाहिए कि उनकी ऐसी कोशिशें आगे और परवान चढ़ेंगी।

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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