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किशन महाराज का नाम रहेगा

वाराणसी, 6 मई (आईएएनएस)। तबला सम्राट किशन महाराज के निधन से काशी ने अपना वो अनमोल हीरा खो दिया है जो सदियों में कभी कभार ही पैदा होता है। यह अलग बात है कि इतने बड़े कलाकार का सम्मान रखने के लिए प्रदेश सरकार ने उनके दाह संस्कार में अपने किसी नुमाइंदे को भेजना भी जरूरी नहीं समझा। 

पं. किशन महाराज भारतीय संगीत जगत की महान हस्ती होने के आम लोगों के लिए बेहद सहज-सुलभ थे। आपको शायद यह जानकर शायद हैरानी होगी कि किशन महाराज जिस मुहल्ले में रहते थे वहां पर एक दर्जन से ऊपर पद्मश्री और पद्मभूषण पुरस्कार विजेता निवास करते हैं। तबला सम्राट इन सभी लोगों के सम्मानित गुरु ही नहीं बल्कि गार्जियन भी माने जाते थे।  

वाराणसी के कबीरचौरा मुहल्ले के पास जिस गली में किशन महाराज रहते थे उसे कलाकारों और पद्म अलंकरणों वाली गली भी कहा जाता है। क्योंकि इस गली में पद्मभूषण पाने वालों में गिरजा देवी, गुदई महाराज, राजन साजन मिश्र, सितारा देवी सहित कई नामी गिरामी कलाकार आज भी रहते हैं। 

किशन महाराज के बारे में कहा जाता है कि वे एक ओजस वृत्ति और मार्मिक अभिव्यक्ति  वाले व्यक्ति थे। किशन महाराज ने जहां अपनी कला साधना से शौहरत की बुलंदियों को छुआ और कृष्ण प्रसाद से किशन महाराज हुए ,वहीं वे अपने अल्हड़पन और कोमल हृदय के कारण वाराणसी के साधारण लोगों के लिए किसन चच्चा भी थे। 

मुहल्ले में ही पान की  एक दुकान है जहां महाराज जी की बैठक जमती थी। सुबह शाम महाराज जी यहां जरुर आते थे। पान की दुकान चलाने वाला छांगुर भावुक होकर कहता है कि वे सबके लिए भले ही महाराज होंगे लेकिन हमारे लिए तो चच्चा ही थे। पान के शौकीन किशन महाराज यही बैठ कर पूरे मुहल्ले का हालचाल लेते और देश -दुनिया की बातें करते थे। 

पान की दुकान पर किशन महाराज का साथ देने वालों में राजेश्वर आचार्य, अल्हड़ दादा सहित अशोक और छांगउर प्रमुख थे। राजेश्वर आचार्य बताते हैं कि  पंडित जी का पान की दुकान का ठहाका बडा मशहूर था, उसे सुनकर लोग जान जाते थे कि पंडिज जी दुकान पर आ गए हैं।  आचार्य बताते हैं कि पिछले दो साल से अस्वस्थता कि वजह से उनका निकलना कम हो गया था।

 अशोक  बताते हैं कि जब हम पान लेकर घर जाते थे तो वे सबका हाल चाल जरूर  पूछते थे। वे अक्सर भोजपुरी में ही बातें करना पसंद करते थे, जिसे वे अपनत्व की भाषा कहा करते थे। वे हमेशा कुरता पाजामा ही पहनते थे कि जिसमें कुरता तो बनारस का होता था लेकिन उस पर कढ़ाई कोलकाता से होती थी।  

किशन महाराज भले ही दुनिया से कूच कर गए हों पर बनारस के बाशिंदों के जेहन महाराज जी से जुड़ी अनगिनत यादें हमेशा जिंदा रहेंगी। 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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